Friday, 31 August 2012

ए जिन्दगी

जिन्दगी ...!
आ अब मैं तुम्हे हारना
चाहती हूँ 
तुमसे जीतना मुझे अब 
नामुमकिन 
ही लगता है ...
कभी तुम्हे बुलाया तो
चुप रहने को
कहती हो ,
चुप भी रहूँ तो ढेरों सवाल
लिए आ खड़ी होती हो...
अब बस तुझे बहुत
जी लिया ,
अब तुम्ह्ने हारना
ही चाहती हूँ ...
तुम्हारे आगे - पीछे ,
बहुत घूम लिया मैंने ,
बस अब तुमसे दामन छुड़ाने
को मन करता है ...
कभी मृगतृष्णा सी तुम
और कभी
तुम कस्तूरी की तरह हो
अब मैं तुम्हें तलाशते हुए 
और नहीं खोना चाहती 
तुम्हे हारना ही चाहती हूँ ...
तुम्हारे कोई भी रंग
अब मुझे,
अपनी और नहीं बुलाते ,
अब मैं काले रंग को
ओढ़ कर ही ,
तुम्हारे धुएं में गुम
हो जाना चाहती हूँ ...
ए जिन्दगी !
अब मैं तुम्हे
हारना ही चाहती हूँ...

Thursday, 30 August 2012

सिर्फ तुम .....


कभी - कभी कोई,
किसी के लिए
दरवाज़े जब .स्वयं ही बंद
कर देता है ,
तो वह  अक्सर
उसी की आहट का
इंतजार क्यूँ करता है ....
क्यूँ ...!
हवा में हिलते , सरसराते
पर्दों को थाम ,
उनके पीछे ,
उस  के होने की चाह
रखता है .....
और क्यूँ ...!
अक्सर खिड़की बंद करने
के बहाने से
 दूर सड़क को ताकता
 रहता है ,
सिर्फ
उसी  को आते हुए
देखने की चाह में ..........!

Thursday, 23 August 2012

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बेशक हम उनका
मौन समझ लेते हैं ..
अब उन्हें क्या
 मालूम ....
हम भी तो उनको,
 सुनने को तरसते हैं ...

Tuesday, 21 August 2012

मायका

मायके से विदाई की बेला के
 साथ -साथ मन और आँखों
 का एक साथ भरना और 
एक -एक करके बिखरा सामान
 सहेजना .........
बिखरे सामान को सहेजते हुए हर
 जगह-कोने में ,अपना एक वजूद 
भी नज़र आया,
 जो बरसों उस घर में जिया था ..........
कुछ खिलौने ,कुछ पेन -पेंसिलें ,
कुछ डायरियां और वो दुपट्टा भी 
जो माँ ने पहली बार सँभालने को
 दिया था ..........
कुछ माँ की नसीहते और पापा की
 हिदायतें भी .................
टांड पर उचक कर देखा तो एक 
ऊन का छोटा सा गोला लुढक आया 
साथ में दो सींख से बनी सिलाइयां 
भी ,
जिस पर कुछ बुना  हुआ था एक नन्हा
 ख्वाब जैसा ,उलटे पर उलटा और
 सीधे पर सीधा...........
अब तो जिन्दगी की उधेड़-बुन में 
उलटे पर सीधा और सीधे पर उल्टा ही 
बुना जाता है ...........
कुछ देर बिखरे वजूद को समेटने की
 कोशिश में ऐसे ही खड़ी रही.......
 पर  कुछ भी समेट ना सकी और 
दो बुँदे आँखों से ढलक पड़ी ............

Monday, 20 August 2012

क्या ये चंद्रमा तुम जैसा नहीं है ...

इस ब्रह्मांड में हजारों 
ग्रह - नक्षत्र है ,
और इन ग्रहों के 
कई - कई चंद्रमा है ...

लेकिन पूरे ब्रह्मांड में

इस धरा
जैसा तो कोई
भी ना होगा ,
इसका तो चंद्रमा भी
एक ही है ...

केवल धरा के लिए
एक ही चंद्रमा
और इसके ही इर्द -गिर्द
चक्कर लगाता है हुआ
इसी को रोशन करता हुआ ...

क्या ये चंद्रमा
तुम जैसा नहीं है
मुझे तो
 कुछ ऐसा ही लगता है
और तुम्हे ...?

Monday, 13 August 2012

स्वतंत्रता दिवस..


मैं आज़ाद भारत की जनता
बेबस ,लाचार, लुटी -पिटी ,
जानवरों की तरह रहने
की आदी......
यह शब्द सुनने मुझे अच्छे
नहीं लगते ....
क्यूँ कि वे सारे ही गुण
मुझ में नहीं है ............
हाँ मैं सहनशील जरुर हूँ ,
पर कमजोर नहीं ...
मुझे मेरे वीरो पर गर्व है ,
मैं उन ज्ञात - अज्ञात
वीरो को भूली नहीं हूँ ,
जो शहादत की राह चले
गए ......
अब मैं सिर्फ भूत मैं ही नहीं
जीती ना इतराती ....
अब मैं वर्तमान में रह कर
भविष्य पर नज़र रखती हूँ ......
गलत के विरूद्ध आवाज़ 
भी उठाती हूँ ..
हाँ , मैं  कुछ समय के लिए
भ्रमित जरुर हुई  थी,
पर भटकी नहीं......
मुझे गर्व होता है कि मैं
भारत देश का हिस्सा
हूँ ..........
स्वतंत्रता दिवस पर मैं
धरती माँ के उन सपूतों
को नमन करती हूँ जिनके
कारण आज हम आज़ाद
है........

Friday, 10 August 2012

कान्हा, तुम अब धरा पर मत आना


कान्हा ,
तुमने कहा था ....
जब भी धर्म की  हानि होगी ,
मैं इस धरा पर आऊंगा ...
पर तुम हो कहाँ पर 
नज़र ही नहीं आते ........
अगर आग्रह मानो मेरा ,
अब तुम धरा पर मत आना ...
बन पंगु इंसान 

 कब तक , 
आखिर कब तक 
किसी अवतार का तकेगा सहारा ......
तुम क्यूँ नहीं हर इन्सान में 
हिम्मत और प्रेरणा 
 बन  समा जाते ......

द्रोपदी का चीर तो  बढाया ,
पर 'का-पुरुषों' के
 विरुद्ध 
शस्त्र उठाना नहीं सिखाया 
अब हर युग में द्रोपदी ,
तुम्हारा ही सहारा तकती है ...

तुम क्यूँ नहीं दामिनी सी 
शक्ति बन समा जाते हर नारी में ...
अब तुम धरा पर मत आना ,
आना तो बस  विचार बन 
कर ही अवतरित होना ........

Thursday, 9 August 2012

कभी -कभी खाली घर भी बोलने लग जाता है


कभी -कभी खाली 
घर भी बोलने  लग जाता है ,
 सुन कर देखा है कभी ...!
दरवाज़े ,दीवारें और 
बंद अलमारियां भी 
गुनगुनाने लग जाती है .....
दरवाज़ों पर होली से रंगे ,
नन्हे - नन्हे हाथ 
थपथपाने लग जाते हैं ....
अलमारी में रखी ,
छोटी सी थाली ,कटोरी ,
गिलास और चम्मच के 
साथ खनखनाने लग जाती है ...
परछत्ती से कुछ खिलौने 
झाँकने लगते है ...
छोटा सा बन्दर मुहं चिढाता है तो 
एक छोटी सी लाल रंग की कार 
आगे से सर्र से निकल जाती है ....
और कभी "टिप -टिप ,चियू -चियू ..."
की जूतों में से आती 
आवाज़ की आहट पर
 पीछे मुड़ कर देखो तो ,
नज़र आते हैं दो डगमगाते ,
नन्हे -नन्हे कदम  
और अपनी  ओर बाहें फैलाते 
 दो प्यारे -प्यारे हाथ .,
और गूंज उठती है किलकारियां .......
कभी सुन कर देखो ,
खाली घर भी बोल उठते है 
कभी - कभी .....