Tuesday, 28 May 2013

नारी ही बांधती सभी रिश्ते -नाते ...

नाते -रिश्ते
जैसे
खड़ी दीवारें ,
तपती धूप में खड़ी
भीगती बारिश में ,
सर्द हवाओं के थपेड़े झेलती ...

नारी ही बांधती
बन कर
छत की तरह
सभी रिश्ते -नाते ...

 सभी को समेट लेती
बचा लेती ,
तपती धूप
बरसती बारिश
सर्द हवाओं के  थपेड़ों से ...

मजबूत छत
 जैसी नारी
रिश्ते मिलते उसे
बर्फ की दीवारों से ...

बचाती -समेटती
नाते - रिश्तों को
नारी के हाथ क्या रहता
एक दिन
सिवाय
पिघली बर्फ के ...!




( चित्र गूगल से साभार )