Saturday, 28 September 2013

अकेली हूँ फिर भी अकेली कब होती हूँ ....

कभी -कभी
लगता है  मुझे
 नहीं है कोई भी मेरा
इस जहान में ...
है मेरे चहुँ ओर
बहुत सारे लोग ,
ऐसा लगता है मुझे
 फिर भी हूँ अकेली ...
अकेली हूँ फिर भी
अकेली कब होती हूँ
एक शोर सा ,
कोलाहल सा
मेरे मन के सन्नाटे को
रहता है चीरता सा ,
झन्झोड़ता सा ...
इस कोलाहल में भी
एक सन्नाटा सा छा जाता है
जब सुनती हूँ
एक खामोश सी पुकार ...
वह पुकार मुझे
फिर से  कर देती है
चुप और खामोश ....