Wednesday, 8 March 2017

एक दिन

एक दिन
थम गई थी
घूमते-घूमते
जब धरा,

उस दिन
रुक गई थी
सहसा ही
चलते-चलते
जब हवा,

उसी दिन ही
सिमटा सा लगा
दूर तक फैला ,
आसमां..

ऐसे खामोश
थमे,रुके, सिमटे
जहां में
वह कैसा जलजला था ,
डगमगाए जाता था
मुझे...

शायद
स्पंदन थी
मेरे ह्रदय की
जो कंपन बनी थी
या कुछ और था..!


12 comments:

  1. बहुत सुंदर और भावपूर्ण रचना.

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  2. सुन्दर रचना

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  3. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/03/10.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!
    मित्र-मंडली का संग्रह नीचे दिए गए लिंक पर संग्रहित हैं।
    http://rakeshkirachanay.blogspot.in/p/blog-page_25.html

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  4. बहुत भावपूर्ण रचना ...

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  5. बहुत ही बढ़िया article है ..... ऐसे ही लिखते रहिये और मार्गदर्शन करते रहिये ..... शेयर करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। :) :)

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  6. http://bulletinofblog.blogspot.in/2017/03/blog-post_21.html

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  8. शायद
    स्पंदन थी
    मेरे ह्रदय की
    जो कंपन बनी थी
    या कुछ और था..!
    सुन्दर रचना !भावना से ओत-प्रोत
    आभार। "एकलव्य"

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